Om Durgaye Nmh

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Thursday, 4 October 2012

कंप्लेंट केस में शिकायती को कोर्ट में देना होता है सबूत.

कंप्लेंट केस में शिकायती को कोर्ट में देना होता है सबूत.

आए दिन अदालत में कंप्लेंट केस दाखिल किया जाता है और उस मामले में शिकायती के बयान दर्ज किए जाते हैं। अगर कोर्ट बयान से संतुष्ट हो जाए तो आरोपी के नाम समन जारी किया जाता है। इस तरह के कंप्लेंट केस कब दाखिल किए जाते हैं और इसके लिए क्या कानूनी प्रावधान है, बता रहे हैं |

संज्ञेय अपराध के लिए .....
अगर किसी संज्ञेय मामले में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करती तो शिकायती सीआरपीसी की धारा-156 (3) के तहत अदालत में अर्जी दाखिल करता है और अदालत पेश किए गए सबूतों के आधार पर फैसला लेती है। कानूनी जानकार बताते हैं कि ऐसे मामले में पुलिस के सामने दी गई शिकायत की कॉपी याचिका के साथ लगाई जाती है और अदालत के सामने तमाम सबूत पेश किए जाते हैं। इस मामले में पेश किए गए सबूतों और बयान से जब अदालत संतुष्ट हो जाए तो वह पुलिस को निर्देश देती है कि इस मामले में केस दर्ज कर छानबीन करे।

असंज्ञेय अपराध के लिए...... 
मामला असंज्ञेय अपराध का हो तो अदालत में सीआरपीसी की धारा-200 के तहत कंप्लेंट केस दाखिल किया जाता है। कानूनी जानकार डी. बी. गोस्वामी के मुताबिक कानूनी प्रावधानों के तहत शिकायती को अदालत के सामने तमाम सबूत पेश करने होते हैं। उन दस्तावेजों को देखने के साथ-साथ अदालत में प्रीसमनिंग एविडेंस होता है। यानी प्रतिवादी को समन जारी करने से पहले का एविडेंस रेकॉर्ड किया जाता है।

प्रतिवादी कब बनता है आरोपी .......
शिकायती ने जिस पर आरोप लगाया है, वह तब तक आरोपी नहीं है, जब तक कि कोर्ट उसे बतौर आरोपी समन जारी न करे। यानी शिकायती ने जिस पर आरोप लगाया है, वह प्रतिवादी होता है और अदालत जब शिकायती के बयान से संतुष्ट हो जाए तो वह प्रतिवादी को बतौर आरोपी समन जारी करती है और इसके बाद ही प्रतिवादी को आरोपी कहा जाता है, उससे पहले नहीं। क्रिमिनल लॉयर अजय दिग्पाल के मुताबिक कंप्लेंट केस में शिकायती के बयान से अगर अदालत संतुष्ट न हो तो केस उसी स्टेज पर खारिज कर दिया जाता है। एक बार अदालत से समन जारी होने के बाद आरोपी अदालत में पेश होता है और फिर मामले की सुनवाई शुरू होती है।

पुलिस केस और कंप्लेंट केस में फर्क ........
कंप्लेंट केस में शिकायती को हर तारीख पर पेश होना होता है। लेकिन शिकायत पर अगर सीधे पुलिस ने केस दर्ज कर लिया हो या फिर अदालत के आदेश से पुलिस ने केस दर्ज किया हो तो शिकायती की हर तारीख पर पेशी जरूरी नहीं है। ऐसे मामले में जिस दिन शिकायती का बयान दर्ज होना होता है, उसी दिन शिकायती को कोर्ट जाने की जरूरत होती है। कंप्लेंट केस में शिकायती को तमाम सबूत अदालत के सामने देने होते हैं, जबकि पुलिस केस में पुलिस मामले की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश करती है। पुलिस केस में शिकायती और आरोपी के बीच समझौता होने के बाद कोर्ट की इजाजत से केस रद्द किया जा सकता है, वहीं कंप्लेंट केस में शिकायती चाहे तो केस वापस ले सकता है।
 

पति देगा 10 लाख, दहेज का केस रद्द...

पति देगा 10 लाख, दहेज का केस रद्द...

नई दिल्ली।। दहेज प्रताड़ना के एक मामले में दोनों पक्षों में समझौता हो जाने और इसके मुताबिक पत्नी को 10 लाख रुपये देने पर पति के राजी होने के बाद हाई कोर्ट ने इस मामले में दर्ज एफआईआर रद्द करने का निर्देश दिया। अदालत ने आरोपी को बतौर हर्जाना 25 हजार रुपये डिफरेंटली एबल्ड वकीलों के लिए बनाए गए फंड में देने का आदेश भी दिया।

इस मामले में आरोपी पति ने हाई कोर्ट में अर्जी देकर कहा कि उसका अपनी पत्नी से समझौता हो चुका है, दोनों में तलाक हो चुका है और पत्नी को इस बात से ऐतराज नहीं है कि केस रद्द कर दिया जाए। इसके लिए पत्नी की ओर से दी गई अंडरटेकिंग भी अदालत में पेश की गई। अदालत को बताया गया कि तलाक के दौरान साढ़े 6 लाख रुपये पत्नी को दिए गए और बाकी साढ़े तीन लाख रुपये अदालत में दिए जा रहे हैं। इस दौरान सरकारी वकील नवीन शर्मा ने दलील दी कि इस मामले में पुलिस का काफी वक्त जाया हुआ है। केस में गवाही चल रही है, ऐसे में अगर इस स्टेज पर केस रद्द किया जाए तो आरोपी पर हर्जाना लगाया जाना चाहिए। इसके बाद अदालत ने आरोपी पर हर्जाना लगाया और निर्देश दिया कि वह 25 हजार रुपये बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के डिसेबल्ड लॉयर्स के फंड में जमा करे।

यह मामला चांदनी महल इलाके का है। 14 जुलाई, 2006 को आरोपी पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और अमानत में खयानत का केस दर्ज किया गया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, यह शादी 21 मई, 2005 को हुई थी। शादी के बाद 3 मार्च, 2006 को लड़की ने बच्ची को जन्म दिया। बाद में पति-पत्नी में अनबन शुरू हो गई और फिर लड़की ने अपने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज कराया। इस दौरान महिला ने अपने पति और ससुरालियों के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के तहत भी केस दर्ज कराया। बाद में वह अपनी बच्ची को लेकर चली गई। उसने भरण पोषण संबंधी अर्जी भी दाखिल की। इस दौरान पति ने बच्ची की कस्टडी के लिए याचिका दायर की। फिर यह मामला मध्यस्थता केंद्र को रेफर हो गया और तब इनमें समझौता हो गया और दोनों पक्ष केस वापस लेने को राजी हो गए। साथ ही दोनों तलाक लेने को भी राजी हुए। इस दौरान यह तय हुआ कि पति अपनी पत्नी को 10 लाख रुपये देगा। इसी समझौते के तहत पति ने सवा तीन लाख रुपये तलाक के पहले मोशन पर जबकि सवा तीन लाख रुपये दूसरे मोशन पर दिए और बाकी साढ़े तीन लाख रुपये हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी के हवाले किया।


 

दहेज प्रताड़ना : महिला 1, पति 2

दहेज प्रताड़ना : महिला 1, पति 2

नई दिल्ली।। अदालत में दहेज प्रताड़ना का एक अनोखा केस चल रहा है। पीड़ित महिला ने अपने पहले पति को तलाक दिए बिना दूसरी शादी कर ली, लेकिन यह शादी भी ज्यादा नहीं चल पाई। लिहाजा महिला ने दूसरे पति को भी छोड़ दिया। महिला ने अपने दोनों पतियों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना के तहत पुलिस में कंप्लेंट कर दी।

पुलिस ने महिला की कंप्लेंट पर पहले पति और उसके परिवार वालों के साथ-साथ दूसरे पति के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया। फिलहाल इस केस की सुनवाई महिला कोर्ट की मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट एकता गाबा की अदालत में चल रही है। अदालत ने सरकारी पक्ष को गवाही शुरू कराने का आदेश दिया है।

पेश मामले के मुताबिक जनकपुरी इलाके में रहने वाली बलजिंदर कौर की शादी नवंबर 1990 में बलविंदर सिंह (दोनों बदले हुए नाम) के साथ हुई थी। लड़की वालों ने अपनी हैसियत के मुताबिक दहेज भी दिया था। बलविंदर सिंह का मुंबई में भी घर था। लिहाजा शादी होते ही वह लड़की को साथ लेकर मुंबई चला गया। शादी के कुछ समय बाद ही ससुराल वालों ने लड़की को दहेज के लिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। 13 जनवरी 1991 को पहली लोहड़ी मनाने बलजिंदर कौर अपने मायके आई। यहां आने के बाद भी ससुराल वालों ने उसके परिवार वालों के सामने दहेज की डिमांड रखी। लड़की के पिता ने उसी वक्त उधार लेकर 20,000 रुपये लड़की के ससुराल वालों को दिए। इसके बाद वह वापस मुंबई लौट गई।

वापस लौटने के बाद भी उसे लगातार दहेज के लिए प्रताडि़त किया जाता रहा। परेशान होकर उसने अपने पति का घर छोड़ दिया। कुछ समय तक अकेला रहने के बाद उसने योगेंद्र सिंह उर्फ टोनी (बदला हुआ नाम) से दूसरी शादी कर ली। दुर्भाग्यवश महिला की दूसरे पति से भी बन नहीं पाई। लिहाजा महिला ने दूसरे पति को भी छोड़ दिया।

महिला ने पहले पति सास, ससुर और ननद के अलावा दूसरे पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की कंप्लेंट की। कंप्लेट में महिला ने बलविंदर सिंह और योगेंद्र सिंह को अपना पति बताया है। कंप्लेंट में कहीं पर भी इस बात का जिक्र नहीं है कि उसने पहले पति को तलाक देकर दूसरी शादी की। पुलिस ने अपना पल्ला झाड़ते हुए पांचों आरोपियों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का दर्ज कर लिया। इस मामले में एफआईआर 2001 में दर्ज की गई थी, लेकिन अभी तक मामला लटका हुआ है। फाइल जब ट्रांसफर होकर मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट एकता गाबा की अदालत में पहुंची तो अदालत भी यह देखकर हैरान रह गई कि महिला के दो-दो पतियों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा कैसे दर्ज हो सकता है? बहरहाल, अब इसमें गवाही शुरू होगी।

Friday, 3 August 2012

'पापा अंदर जल रहे थे, मां ने बाहर से दरवाजा बंद किया'

नई दिल्ली। पति-पत्नी के बीच झगड़ा आम बात है लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति पैदा हो गई कि बाथरुम में बंद पति आग की लपटों में घिरा रहा और पत्नी बाहर खड़ी तमाशा देखती रही? आखिर 18 साल की शादी के बाद ऐसी कौन सी नौबत आ गई कि पत्नी बेटी के सामने ही इतना क्रूर रवैया अपनाती रही? पिता मदद के लिए चिल्लाता रहा और मां ने बेटी को जकड़ कर रख लिया? मनोवैज्ञानिकों की मानें तो इसकी वजह सामान्य नहीं हो सकती। झगड़े के इतने बड़े रूप लेने की वजह तभी हो सकती है जब वो शख्स साइको हो।

दरअसल नाबालिग बेटी की मानें तो मां जसलीन पिता हरपाल से अलग होना चाहती थी। कई सालों से अनबन होने की वजह से जल्द ही दोनों का तलाक होने वाला था। जबकि संपत्ति को लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ता ही जा रहा था। मां पैसे मांगती थी जबकि पिता इसे लिखित में चाहते थे। साथ ही इस बात को भी लिखित में चाहते थे कि अब तक जसलीन ने हरपाल से क्या कुछ लिया है? इसी संपत्ति के विवाद में मां पिता के खिलाफ खौफनाक साजिश रचने लगी।

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो ऐसी स्थिति में झगड़े की वजह को समझना बहुत जरूरी होता है। साथ ही ऐसे मामले में मनोवैज्ञानिकों की राय लेनी जरूरी होती है। क्योंकि अगर इसका सही समय पर इलाज नहीं कराया गया तो कभी कभी ये स्वभाव मानसिक बीमारी की शक्ल ले लेता है। जिसे आम तौर पर लोग समझ नहीं पाते।

कुल मिलाकर दिल्ली के भोगल में जो कुछ हुआ उसने हर किसी को हैरान कर दिया है। ये साफ कर दिया है कि मामूली झगड़ा किस तरह से एक बड़ी घटना का रूप ले सकता है।
बता दें कि कुछ दिनों पहले तक ये मामला हादसा बताने की कोशिश की जाती रही। दरअसल घर में जले इनवर्टर, बैटरी कुछ इसी तरफ इशारा कर रहे थे लेकिन बेटी ने जैसे ही मां के खिलाफ मुंह खोला साजिश की कड़ियां खुद ब खुद जुड़ने लगीं। बेटी के बयान के बाद ही मां को गिरफ्तार कर लिया गया है।
ये सवाल महीने भर तक कर गुत्थी बने रहे। जब तक बेटी सामने नहीं आई लेकिन जैसे ही मामला खुला पिता की मौत का राज सामने आ गया। पुलिस के मुताबिक शुरुआती तफ्तीश में इस मामले को हादसा करार देने की भरसक कोशिश की गई। दरअसल पुलिस के मुताबिक इस मामले में कोई गवाह सामने नहीं था।
घर में जला हुआ इनवर्टर मिला, बैट्री में आग लग गई थी, वहां जले हुए कपड़े मिले लेकिन जैसे ही बेटी सामने आई पुलिस ने सबसे पहले सीआरपीसी की धारा 164 के तहत कोर्ट में बेटी का बयान दर्ज कराया। इस बयान के अलावा पुलिस ने परिस्थितिजन्य सबूतों और फॉरेंसिक रिपोर्ट के मद्देनजर जसलीन को गिरफ्तार कर लिया।
लेकिन सवाल ये है कि आखिर ऐसी कौन सी स्थिति पैदा हो गई कि मां पर ही पिता की हत्या का आरोप लग रहा है। आखिर क्यों मां ने बेटी को रोकने की कोशिश की। बेटी की मानें तो घर में मां-पिता के बीच अक्सर झगड़ा होता था। मां पिता से अलग होना चाहती थी, साथ ही पैसे की मांग भी करती थी।
वैसे 15 साल की इस नाबालिग बेटी की मानें तो कई दिनों से मां के इरादे खौफनाक थे। मां ने बकायदा अपनी पति की हत्या की साजिश रची। कुछ दिन पहले से ही ऐसे काम करने लगी थीं। जिस पर उसने शुरू में तो ध्यान नहीं दिया लेकिन अब जब पिता की जिंदा जलकर मौत हो चुकी है तो हत्या की साजिश की कड़ी जुड़ती नजर आ रही है।
बेटी के मुताबिक पिता की मौत के मामले में मां के खिलाफ कई सबूत हैं। पहला सबूत ये है कि घटना से कई दिन पहले ही उसने नायलॉन से कपड़े निकालने शुरू कर दिए जो आग लगने की जगह पर मिला। दूसरा सबूत ये है कि बाथरूम की कुंडी पर तार लगाया गया ताकि वो अंदर से न खुल पाए।
तीसरा सबूत ये है कि जब बाथरुम में आग लगी तो मां वहां खड़ी तमाशा देखती रही। चौथा सबूत ये है कि जब बेटी और दूसरे लोगों ने बचाने की कोशिश की तो न सिर्फ उसने रोका बल्कि ये भी कहा कि अंदर कोई नहीं है। अब बेटी की एक ही ख्वाहिश है कि उसकी मां को सजा मिले ताकि उसके पिता को इंसाफ मिल सके।
यही नहीं मैकेनिकल इंजीनियर हरपाल सिंह का परिवार भी उनकी पत्नी के खिलाफ आरोप लगा रहा है। हरपाल गुड़गांव की एक कंपनी में काम करते थे लेकिन आते जाते अक्सर नीचे के फ्लोर में रह रही अपनी मां से मिलते थे। हरपाल की मां की मानें तो वो अक्सर पत्नी की ज्यादती की शिकायत करता रहता था।
हरपाल की जसलीन से शादी 1994 में हुई थी लेकिन शुरू से ही दोनों में काफी लड़ाई होती थी। हरपाल की मां की मानें तो घटना वाले दिन भी बहू की हरकत संदेह के घेरे में रही। इनके मुताबिक अगर पत्नी बाथरुम और घर का दरवाजा खोल देती तो हरपाल की जिंदगी बचाई जा सकती थी।
इस घटना के बाद पुलिस ने कई बार हरपाल की नाबालिग बेटी के साथ पूछताछ की है। बेटी की अब एक ही इच्छा है कि मां को उसके किए की सजा मिले और पिता को इंसाफ मिले। इसके लिए जितनी भी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। इसके लिए वो तैयार है।

Saturday, 28 July 2012

प्रेमी किरायेदार के साथ मिलकर पत्नी ने की पति की हत्या.......

नई दिल्ली
किरायेदार के साथ प्रेम संबंध थे और इस कारण पति को रास्ते से हत्या की योजना बनाई गई और फिर किरायेदार के साथ मिलकर पति की हत्या को अंजाम दिया गया। निचली अदालत ने इस मामले में सोनिया और उसके किरायेदार सतपाल को उम्रकैद सुनाई। मामला हाई कोर्ट के सामने आया। हाई कोर्ट ने कहा कि सोनिया ने सतपाल के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची। दोनों की अपील खारिज कर दी गई। सोनिया इस मामले में खुद ही शिकायती बनी थी।

मामला 2004 का है। उत्तम नगर इलाके में रहने वाली सोनिया उर्फ गुड्डो ने बयान दिया कि जब वह अपने एक जानकार राकेश के साथ घर पहुंची तो उसके पति घर में लहूलुहान पड़े हुए थे। पुलिस के मुताबिक, 23 सितंबर 2004 को सोनिया ने बयान दिया कि वह अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने गई थी। वापस आई तो उसके पति ने कहा कि उनके जानने वाले राकेश को बुलाकर ले आए। वह राकेश के साथ जब घर पहुंची तो उसके पति मनोज कुमार मरे पड़े थे।

इस दौरान उसने राकेश से कहा कि वह पुलिस को इत्तला न करे लेकिन पड़ोसियों ने पुलिस को इत्तला की। पुलिस ने सोनिया के बयान के आधार पर हत्या का केस दर्ज कर छानबीन शुरू कर दी। पुलिस ने सोनिया की बेटी और राकेश का बयान दर्ज किया। दोनों के बयान सोनिया के बयान से मेल नहीं खा रहे थे। पुलिस को शिकायती सोनिया पर शक हुआ और उसने दोबारा सोनिया से पूछताछ की। सोनिया ने पुलिस के सामने इकबालिया बयान दिया। सोनिया के बयान के आधार पर पुलिस ने खून से सना तौलिया और अन्य कपड़ें बरामद किए। उसके बयान के आधार पर इस मामले का दूसरा आरोपी सतपाल करनाल रोड से गिरफ्तार किया गया। सतपाल के बयान के आधार पर लोहे की पाइप बरामद की गई जिससे हत्या को अंजाम दिया गया था। यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था।
अदालती सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सतपाल सोनिया और मनोज का किरायेदार था। दोनों में अवैध संबंध थे। मनोज की बेटी ने बयान दिया कि उसने सुबह 7:15 बजे अपने पिता मनोज, मां सोनिया और सतपाल को एक साथ घर में देखा था। सतपाल कुसीर् पर बैठा था जबकि मनोज नीचे। दूसरी तरफ सोनिया ने पुलिस को बयान दिया था कि सतपाल सुबह 5:30 से 6 के बीच घर से निकल गया था। इस मामले में 19 गवाह बनाए गए। निचली अदालत ने हत्या की साजिश में सोनिया और सतपाल को उम्रकैद सुनाई जबकि सतपाल को हत्या के लिए भी उम्रकैद सुनाई गई।

मामला हाई कोर्ट के सामने आया। हाई कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य से साफ है कि सतपाल पेइंग गेस्ट के तौर पर मनोज के घर रहता था। राकेश उन सभी को जानते थे। राकेश ने बयान दिया था कि अक्सर सोनिया और सतपाल एक साथ मजार जाते थे। जब वह सोनिया के साथ घर पहुंचे तो सोनिया ने दरवाजा चाबी से खोला और अंदर मनोज मरा पड़ा था। अदालत ने कहा कि सतपाल और सोनिया में प्रेम संबंध था और इसी कारण मनोज को रास्ते से हटाया गया।

दहेज केस में समझौता देगा बेस्ट ऑप्शन

दहेज केस में समझौता देगा बेस्ट ऑप्शन

दहेज प्रताड़ना मामले को समझौता वादी किए जाने को लेकर लॉ कमिशन सिफारिश करने की तैयारी में है। दरअसल अभी तक दहेज प्रताड़ना का मामला गैर समझौता वादी है और इस मामले में समझौता होने के बाद भी केस रद्द करने के लिए हाई कोर्ट से गुहार लगानी पड़ती है और दोनों पक्षों की दलील से संतुष्ट होने के बाद ही हाई कोर्ट मामला रद्द करने का आदेश देती है लेकिन अगर केस समझौता वादी हो जाए तो मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में ही अर्जी दाखिल कर मामले में समझौता किया जा सकता है। मैजिस्ट्रेट मामले को खत्म कर सकता है। कानूनी जानकार बताते हैं कि दहेज प्रताड़ना मामले को समझौता वादी किए जाने का बेहतर परिणाम देखने को मिलेगा।
जानकार बताते हैं कि कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि दहेज प्रताड़ना से संबंधित मामले को टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। कई बार हाई कोर्ट भी सख्त टिप्पणी कर चुकी है। 2003 में दिल्ली हाई कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जे. डी. कपूर ने अपने एक ऐतिहासिक जजमेंट में कहा था कि ऐसी प्रवृति जन्म ले रही है जिसमें कई बार लड़की न सिर्फ अपने पति बल्कि उसके तमाम रिश्तेदार को ऐसे मामले में लपेट देती है। एक बार ऐसे मामले में आरोपी होने के बाद जैसे ही लड़का व उसके परिजन जेल भेजे जाते हैं तलाक का केस दायर कर दिया जाता है। नतीजतन तलाक के केस बढ़ रहे हैं। अदालत ने कहा था कि धारा-498 ए से संबंधित मामले में अगर कोई गंभीर चोट का मामला न हो तो उसे समझौता वादी बनाया जाना चाहिए। अगर दोनों पार्टी अपने विवाद को खत्म करना चाहते हैं तो उन्हें समझौते के लिए स्वीकृति दी जानी चाहिए। धारा-498 ए (दहेज प्रताड़ना) के दुरुपयोग के कारण शादी की बुनियाद को हिला रहा है और समाज के लिए यह अच्छा नहीं है।

अदालत का वक्त होता है खराब

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) आर. एस. सोढी ने बताया कि कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि पति-पत्नी के बीच गर्मागर्मी के कारण दोनों एक दूसरे के खिलाफ तोहमत लगाते हैं और इस कारण मामला कोर्ट में आ जाता है। लेकिन बाद में दोनों पक्ष को महसूस होता है कि मामले में समझौते की गुंजाइश बची हुई है और दोनों पक्ष अगर समझौता करना चाहें तो उसका प्रावधान होना चाहिए। अभी के प्रावधान के तहत ऐसे मामले में अगर दोनों पक्ष मामला खत्म भी करना चाहें तो उन्हें एफआईआर रद्द करने के लिए हाई कोर्ट में इसके लिए अर्जी दाखिल करनी होती है कई बार दोनों पक्ष कोर्ट के बाहर समझौता कर लेते हैं और अदालत में ट्रायल के दौरान मुकर जाते हैं ऐसे में अदालत का वक्त बर्बाद होता है। अगर दहेज प्रताड़ना मामले को समझौता वादी बनाया जाएगा तो निश्चित तौर पर ऐसे मामलों की पेंडेंसी में कमी आएगी।

और भी विकल्प खुले हैं

जानेमाने सीनियर लॉयर के . टी . एस . तुलसी ने कहा कि मामला समझौता वादी किए जाने से भी दोषी को बच निकलने का कोई चांस नहीं है। लेकिन इसका फायदा यह है कि अगर दोनों पक्ष चाहता है कि वह मामला खत्म कर भविष्य में फिर से साथ रहेंगे तो भी समझौता किए जाने का प्रावधान बेहतर विकल्प होगा अगर दोनों इस बात पर सहमत हों कि अब उन्हें साथ नहीं रहना तो भी आपसी सहमति से तलाक लिए जाने के एवज में दोनों मामले को सेटल कर सकेंगे। वैसे भी दहेज प्रताड़ना मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद भी अधिकतम 3 साल कैद की सजा का प्रावधान है। 3 साल तक की सजा वाले अधिकांश मामले समझौता वादी हैं ऐसे में इसे भी समझौता वादी किया जाना जरूरी है।

महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं

जानीमानी वकील मीनाक्षी लेखी ने कहा कि दहेज प्रताड़ना मामले को समझौता वादी किया जाए और मामला गैर जमानती बना रहे तो दोषी को बचने का चांस नहीं रहेगा। ज्यादातर समझौता वादी केस जमानती होता है लेकिन दहेज प्रताड़ना मामला गैर जमानती है और ऐसी स्थिति में लड़का पक्ष को यह पता होगा कि अगर वह गलती करेंगे तो जेल जाएंगे। अगर किसी भी सूरत में समझौते की गुंजाइश है तो वह समझौते का रास्ता अपना सकते हैं और इस तरह पीडि़ता को जल्दी न्याय मिलेगा। निश्चित तौर पर कई बार देखने को मिलता है कि दहेज प्रताड़ना से संबंधित केस का दुरुपयोग किया जाता है लेकिन कई बार यह भी देखने को मिलता है कि लड़की को इस तरह प्रताडि़त किया जाता है कि वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती ऐसे में दहेज प्रताड़ना से संबंधित कानून में किसी भी तरह की ढिलाई ठीक नहीं होगी। यह कानून इसीलिए बनाया गया ताकि महिलाओं को सुरक्षा दी जा सके और काफी हद तक इस कारण महिलाएं अपने आप को काफी सुरक्षित महसूस करती हैं।

पति की हत्या में पत्नी और प्रेमी को उम्रकैद....

पति की हत्या में पत्नी और प्रेमी को उम्रकैद....

नई दिल्ली
अदालत ने अवैध संबंधों का विरोध करने पर पति की हत्या मामले में मृतक की पत्नी और उसके प्रेमी को उम्रकैद सुनाई है। अदालत ने घरेलू नौकरानी को सबूत नष्ट करने के इल्जाम से बरी कर दिया। अडिशनल सेशन जज अतुल कुमार गर्ग की अदालत ने मृतक की 11 साल की लड़की की गवाही को सबसे अहम माना। लड़की ने अदालत से कहा कि वारदात वाली रात मंदीप सिंह उनके घर आया था। पहले उसने उसकी मां परमजीत कौर के साथ मिलकर उसके पिता को शराब पिलाई। इसके बाद उसे और उसके भाई को नौकरानी के साथ दूसरे कमरे में भेज दिया था। अगले दिन उसके पिता मृत पाए गए थे।

पेश मामले के मुताबिक, 27-28 अक्टूबर 2007 को पुलिस को सूचना मिली थी कि डिफेंस कॉलोनी इलाके में रहने वाले एक शख्स की हत्या हो गई है। पुलिस ने मौके से खून से सना एक चाकू और लोहे का तवा भी बरामद किया। पुलिस को छानबीन से पता चला कि मृतक हरभजन सिंह की पत्नी परमिंदर कौर के किसी मंदीप सिंह नामक शख्स से अवैध संबंध थे। हरभजन सिंह इसका विरोध करता था।

पुलिस ने महिला को हिरासत में लेकर उससे सख्ती से पूछताछ की तो उसने सच बयान कर दिया। पुलिस ने उससे मिली जानकारी के आधार पर मंदीप सिंह को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने सबूत नष्ट करने के आरोप में मृतक की नौकरानी चंदा को भी गिरफ्तार किया। पुलिस ने जब मृतक की लड़की से पूछताछ की तो उसने इस बात का खुलासा किया कि मंदीप सिंह अकसर उनके घर पर आता था। जब भी वह घर आता था उनकी मां उन्हें दूसरे कमरे में भेज देती थी। वारदात वाली रात भी वह उनके घर पर आया था।

अभियोजन पक्ष ने मृतक के बच्चों सहित 21 गवाहों को अदालत में पेश किया। अदालत ने गवाहों के बयान और अभियोजन पक्ष की दलील सुनने के बाद मंदीप सिंह और परमिंदर कौर को हत्या और सबूत नष्ट करने का दोषी करार देते हुए उन्हें उम्रकैद सुनाई। अदालत ने दोनों पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना भी किया। वहीं अदालत ने नौकरानी को संदेह का लाभ देते हुए उसे बरी कर दिया।