क्या आप अपनी पत्नी से परेशान है ? क्या आपकी पत्नी दहेज कानूनों की आड़ में आपको सता रही है ? तो आइये एक जुट होकर आवाज उठाए, संपर्क करे :--09034048772 , ईमेल करे -kamalsharma440@gmail.com
Om Durgaye Nmh
Om Durgaye Nmh
Tuesday, 24 April 2012
Monday, 23 April 2012
एक औरत कहाँ तक गिर सकती है ।
एक औरत कहाँ तक गिर सकती है ।
विधवा बहू के कारनामें से चौंक गए ससुर जी, उड़ गए होश!
रायपुर। पति
की मृत्यु के बाद दूसरी शादी करने वाली युवती ने मृत पति के पिता का मकान
हड़पने के लिए फर्जी दस्तावेज बनवाए और संपत्ति अपने नाम करवा ली। पुलिस से
शिकायत के बाद गड़बड़ी सामने आ गई। पुलिस ने आरोपी बहू के खिलाफ चारसौबीसी
का केस दर्ज कर लिया है।
आरोपी सुषमा निर्मलकर के पति की मौत कुछ
वर्ष पहले हो चुकी है। इसके बाद उसने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी शादी के
बाद उसके दो बच्चे हुए। सुषमा का पहला ससुराल गुढ़ियारी में था। उसने उसी
मकान को हड़पने की योजना बनायी। वह इस कोशिश में कामयाब हो गई। फर्जी
दस्तावेज बनाकर मकान अपने नाम पर करवा लिया। बाद में नगर निगम में नामांतरण
करवाने की अर्जी दी। इसके लिए भी उसने फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए।
उसके
पहले पति की बहन उमा देवी निमर्लकर को इस बात की खबर हो गई। जब उसने इसकी
चर्चा घर वालों से की तो बहु के इस कारनामें से ससुराल के लोग चौंक
गए. उसने एसएसपी दिपांशु काबरा से मिलकर पूरे हालात की जानकारी दी।
उन्होंने इस बात को गंभीरता से लिया और गोलबाजार थाने को निर्देश दिए।
पुलिस ने परीक्षण के बाद अपराध पंजीबद्ध कर लिया। इस मामले में सुषमा के
दूसरे पति की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
इलाहाबाद उच्च न्यायलय की एक महत्वपूर्ण पहल ।
इलाहाबाद उच्च न्यायलय की एक महत्वपूर्ण पहल ।
ARUN KUMAR
Sep 29, 2011 - Public
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक गंभीर पहल करते हुए कहा कि यदि
किसी मामले में पति, उसके परिवार वाले या अन्य रिश्तेदार निचली अदालत में
पेश किए जाएं, तो अदालत उन्हें तत्काल अंतरिम जमानत पर रिहा कर दे और मामले
को मीडिएशन सेंटर भेजें, क्योंकि पति-पत्नी के छोटे-मोटे झगड़े अदालत की
दहलीज पर पहुंचकर उनके रिश्ते में नासूर बन जाते हैं। उच्च न्यायालय की यह
पहल महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीते वर्षों में नगर संस्कृति ने वैवाहिक
रिश्तों के स्वरूप को बदल दिया है। जीवन की आपाधापी में तिल का ताड़ बन
जाने वाले घरेलू मुद्दे अदालतों के चक्कर काटते दिखाई दे रहे हैं।
सामाजिक व नैतिक मूल्यों में आए बदलाव के चलते ‘प्यार’ और ‘विवाह’ की परिभाषा बदल गई है। विवाह अब ‘दायित्व’ के निर्वहन का नाम नहीं, बल्कि अधिकारों की प्राप्ति का युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है। चिंतनीय प्रश्न यह है कि क्यों वैवाहिक संबंधों में बदला लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। विवाह ऐसा बंधन है, जहां स्त्री और पुरुष कुछ रस्में पूरी कर जीवन भर साथ रहने का वचन लेते-देते हैं, परंतु जरूरी नहीं कि जीवनपर्यंत, जीवन में सहजता और सरसता बनी रहे। कभी-कभी अहं का टकराव और वैवाहिक मतभेद संबंधों में खटास पैदा कर देते हैं। स्थिति तब अधिक घातक हो जाती है, जब किसी एक को अपना अस्तित्व खोता नजर आए, जिसकी प्रतिक्रिया कभी-कभी मिथ्या आरोप गढ़कर रिश्तों को नीचा दिखाने की चाह में सलाखों के पीछे पहुंचाने तक की हो जाती है। केवल बयान पर ही ससुराल पक्ष के सभी आरोपियों को जेल भेजे जाने की व्यवस्था ने कानून के नाजायज इस्तेमाल को बढ़ा दिया है। इस बढ़ती प्रवृत्ति पर दिल्ली की एक अदालत ने भी पिछले दिनों चिंता जताई थी। ‘सेव फैमिली फाउंडेशन’ और ‘माई नेशन’ के मुताबिक, भारतीय पति मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक हिंसा का शिकार बन रहे हैं। यह ठीक है कि ऐसे पुरुषों की संख्या पीड़ित स्त्रियों की अपेक्षा बहुत कम हो, लेकिन इस प्रवृत्ति को पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। हमेशा ही यह मानकर नहीं चला जा सकता कि पुरुष सदैव शोषक और स्त्री शोषित ही होती है। यह मानवाधिकार के लिहाज से भी गलत है कि किसी गैरजघन्य अपराध के मामले में बिना जांच किए किसी व्यक्ति को सिर्फ एफआईआर के आधार पर गिरफ्तार कर लिया जाए।
समय बदल रहा है और स्त्री-पुरुष के रिश्ते इस बदलाव में अपना संतुलन खोज रहे हैं। यह संतुलन किसी कानून से नहीं कायम किया जा सकता। कानून से रोका भी नहीं जा सकता। यह कानून का मसला है भी नहीं। कानून तो सिर्फ उसके दुरुपयोग की वजह से कठघरे में खड़ा है। ऐसे कानून हमें चाहिए, लेकिन दुरुपयोग न होने की गारंटी के साथ।
सामाजिक व नैतिक मूल्यों में आए बदलाव के चलते ‘प्यार’ और ‘विवाह’ की परिभाषा बदल गई है। विवाह अब ‘दायित्व’ के निर्वहन का नाम नहीं, बल्कि अधिकारों की प्राप्ति का युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है। चिंतनीय प्रश्न यह है कि क्यों वैवाहिक संबंधों में बदला लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। विवाह ऐसा बंधन है, जहां स्त्री और पुरुष कुछ रस्में पूरी कर जीवन भर साथ रहने का वचन लेते-देते हैं, परंतु जरूरी नहीं कि जीवनपर्यंत, जीवन में सहजता और सरसता बनी रहे। कभी-कभी अहं का टकराव और वैवाहिक मतभेद संबंधों में खटास पैदा कर देते हैं। स्थिति तब अधिक घातक हो जाती है, जब किसी एक को अपना अस्तित्व खोता नजर आए, जिसकी प्रतिक्रिया कभी-कभी मिथ्या आरोप गढ़कर रिश्तों को नीचा दिखाने की चाह में सलाखों के पीछे पहुंचाने तक की हो जाती है। केवल बयान पर ही ससुराल पक्ष के सभी आरोपियों को जेल भेजे जाने की व्यवस्था ने कानून के नाजायज इस्तेमाल को बढ़ा दिया है। इस बढ़ती प्रवृत्ति पर दिल्ली की एक अदालत ने भी पिछले दिनों चिंता जताई थी। ‘सेव फैमिली फाउंडेशन’ और ‘माई नेशन’ के मुताबिक, भारतीय पति मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक हिंसा का शिकार बन रहे हैं। यह ठीक है कि ऐसे पुरुषों की संख्या पीड़ित स्त्रियों की अपेक्षा बहुत कम हो, लेकिन इस प्रवृत्ति को पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। हमेशा ही यह मानकर नहीं चला जा सकता कि पुरुष सदैव शोषक और स्त्री शोषित ही होती है। यह मानवाधिकार के लिहाज से भी गलत है कि किसी गैरजघन्य अपराध के मामले में बिना जांच किए किसी व्यक्ति को सिर्फ एफआईआर के आधार पर गिरफ्तार कर लिया जाए।
समय बदल रहा है और स्त्री-पुरुष के रिश्ते इस बदलाव में अपना संतुलन खोज रहे हैं। यह संतुलन किसी कानून से नहीं कायम किया जा सकता। कानून से रोका भी नहीं जा सकता। यह कानून का मसला है भी नहीं। कानून तो सिर्फ उसके दुरुपयोग की वजह से कठघरे में खड़ा है। ऐसे कानून हमें चाहिए, लेकिन दुरुपयोग न होने की गारंटी के साथ।
शादी के दिन से ही फूट गई बेचारे पति की किस्मत!
शादी के दिन से ही फूट गई बेचारे पति की किस्मत! Source: Bhaskar News | Last Updated 13:18(23/11/11)
रायपुर/ पलारी। ग्राम
खैरा (अमेठी) निवासी दीनदयाल धृतलहरे ने गत रविवार को पुलिस थाने पहुंच
पत्नी के अत्याचार से बचाने की मांग की। इस पर पुलिस ने घरेलू मामला होने
के कारण पत्नी को थाने बुलाकर अत्याचार न करने की हिदायत दी तथा दोनों को
घर वापस भेज दिया। अंचल में यह अपने किस्म का पहला मामला है।
आम
तौर पर तो पत्नी ही पति के अत्याचार से परेशान रहती हैं। लेकिन ग्राम खैरा
का मामला उल्टा है। दीनदयाल पिता संतराम दो बच्चों का पिता है। उसका कहना
है कि उसकी किस्मत तो उसी दिन फूट गई थी, जिस दिन उसकी शादी हुई। शादी के
बाद उसकी पत्नी के अत्याचार का जो सिलसिला शुरू हुआ वह खत्म ही नहीं हुआ।
शुरू में तो लोग हसेंगे सोचकर वह चुप रह जाता था।
धीरे-धीरे जब सबको पता चल गया तो उसने इसे अपनी नियति मान लिया। जब हद से ज्यादा अत्याचार और जान का खतरा महसूस हुआ तो वह थाने पहुंचा लेकिन पुलिस भी इस मामले में कुछ खास नहीं कर सकती थी, उसने उसे घर तो वापस भेज दिया है, लेकिन दीनदयाल के मन से पत्नी की दहशत तो बनी हुई है। इस घटना की चर्चा नगर सहित आसपास रही।
एक पत्नी की घिनोनी करतूत ।
पति को मारने के लिए बुलाए गुंडों ने महिला का गैंग रेप किया ।3 Apr 2012, 1122 hrs IST,टाइम्स न्यूज नेटवर्क फाल्गुनी बनर्जी।। पोल्बा (हुगली)
एक महिला ने अपने प्रेमी की मदद से कुछ गुंडों को अपने पति के कत्ल की
सुपारी दी थी। उन गुंडों ने पति के कत्ल के बाद महिला के साथ गैंग रेप
किया। यह घटना कोलकाता से करीब 60 किलोमीटर दूर हुगली में पोल्बा के पटना
गांव में घटी।
महिला का 50 साल का पति आलू की खेती करता था और
अमीर था। जब वह बाथरूम जाने के लिए उठा, तब उस पर आंगन में हमला हुआ।
कातिलों ने उसका गला काट दिया और कई बार चाकू घोंपा। इसके बाद गुंडों ने
पूरे घर को इस तरह कर दिया जैसे कि वहां पर डकैती हुई हो। उन्होंने महिला
और बेटे को भी बांध दिया। घर से जाने से पहले गुंडों ने महिला के साथ गैंग
रेप किया।
39 साल की इस महिला का प्रेमी 25 साल का एक किसान है।
प्रेमी ने पुलिस को बताया कि उसने गुंडों को रेप करने से रोकने की बहुत
कोशिश की लेकिन गुंडों ने उसे भी बांध दिया था। बेलघरिया, बारानगर और बंदेल
से भाड़े के उन गुंडों को प्रेमी ने ही बुलाया था। महिला और उसके प्रेमी
ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। उन दोनों समेत गुंडों को भी गिरफ्तार कर
लिया गया है।
पूरे मामले में पुलिस को महिला की भूमिका पर तब शक
हुआ कि जब उसे पता चला कि महिला ने अपनी शिकायत में रेप का जिक्र नहीं किया
है, जबकि मेडिकल जांच में इसकी पुष्टि हुई। महिला ने एफआईआर में केवल
डकैती और कत्ल का जिक्र किया था।
दहेज प्रताड़ना कानून का दुरुपयोग
दहेज प्रताड़ना कानून का दुरुपयोग
Oct 08, 11:46 pm
बाहरी दिल्ली, जागरण संवाददाता : रोहिणी कोर्ट की अतिरिक्त सत्र
न्यायाधीश डॉ. कामिनी लॉ ने दहेज प्रताड़ना के एक मामले में शिकायतकर्ता के
रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून की धारा 498ए यानी दहेज प्रताड़ना
का दुरुपयोग हो रहा है। पिछले कुछ समय में ऐसा पाया गया है कि इस कानून की
आड़ में मानव अधिकारों का उल्लंघन, अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के लिए किया जा
रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दुरुपयोग को स्वीकार किया था और कहा था
कि यह कानूनी आतंक है। यह कानून बदला लेने, दहेज की वसूली और तलाक का दबाव
बनाने के लिए नहीं, बल्कि दोषियों को सजा देने के लिए है।
शनिवार को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इस मामले में निचली अदालत के
फैसले को सही ठहराया, जिसमें चार आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर
दिया गया था। मामले के अुनसार शिकायतकर्ता वीणा ने पति, सास-ससुर व देवर के
खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा दर्ज किया था। निचली अदालत ने चारों
आरोपियों को बरी कर दिया, तो वाणी ने सत्र न्यायालय में चुनौती दी। सत्र
अदालत ने पाया कि वीणा व उसके पति के बीच वर्ष 2000 में स्त्रीधन आदि
लेन-देन का मामले का निबटारा हो गया था। उसके बाद वीणा ने ससुराल वालों पर
दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था।
वीणा का आरोप था कि दहेज के लिए उसकी पिटाई की गई, जिससे उसे अस्पताल
में भर्ती होना पड़ा। लेकिन वह अस्पताल का कोई सबूत नहीं पेश कर सकी। साथ ही
अदालत में वीणा के भाई व पिता भी वीणा द्वारा पति पर लगाए गए आरोपों से
इनकार कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे में आरोपियों को कैसे
दोषी ठहराया जा सकता है। इसके लिए अदालत ने प्रसिद्ध कवि साहिर लुधियानवी
की इन पक्तियों का हवाला देते हुए कहा कि 'तार्रुफ रोग हो जाए तो उसको
भुलाना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा। वो अफसाना जिसे
अंजाम तक लाना न हो मुमकीन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।'Sunday, 22 April 2012
दहेज़ विरोधी कानून (498A) का दुरूपयोग “कानूनन-आतंकवाद” के समान हैं
दहेज़ विरोधी कानून (498A) का दुरूपयोग “कानूनन-आतंकवाद” के समान हैं : माननीय सुप्रीम कोर्ट
यह मुद्दा (दहेज़ विरोधी कानून-498A) बहुत ही प्रासंगिक है, कुछ विचारनीय प्रश्न और बिंदु इस प्रकार है :
यह मुद्दा (दहेज़ विरोधी कानून-498A) बहुत ही प्रासंगिक है, कुछ विचारनीय प्रश्न और बिंदु इस प्रकार है :
1. इस दहेज़ विरोधी क़ानून (498A) के दुरूपयोग ने शादी को तोड़ना बहुत आसान बना दिया है और शादी निभाना बहुत कठिन…..
2. टूटती शादीओ का असली बोझ उठाते है , मासूम बच्चे , उनके प्रति भी
कुछ ज़िम्मेदारी है समाज की और क़ानून विशेषज्ञों की ? ईलैक्ट्रानिक मीडिया / चैनल को बच्चो का प्रतिनिधित्व भी करना चाहिए.
3. माननीय कोर्ट को मानवीय सोच के साथ यह भी देखना चाहिये कि इस
प्रकार के कानून मे सिर्फ बहू (विवाहिता/वादी) ही महिला नही है अपितु सास
(माँ), ननद (बहन), व भाभी भी महिला है, जिनको कि बहू (विवाहिता/वादी) सबसे
पहले अभियुक्त बनाती है सिर्फ इस सोच के साथ कि बाद मे समझौते के तहत
अधिक से अधिक एकमुश्त पैसा प्राप्त कर सके ।
4. दहेज के लिए दहेज प्रतिरोधक क़ानून अलग से है, यह क़ानून क्रूरता
के लिए है और इसका इस्तेमाल खुलेआम दहेज से जोड़कर किया जा रहा है, जो की
अपने आप मैं सबूत है, इसके मिसयूज़ का ?
5. यह क़ानून एक गुनहगार को सज़ा दिलाने के लिए लाखो बेगुनाह को
शिकार बना रहा है . इसे बंद कर देना चाहिए. असली सशक्तिकरण शिक्षा से आता
है जो की अर्बन महिलाओ में आ चुका है.
6. इस क़ानून का सिर्फ़ और सिर्फ़ मिसयूज़ है, क्योंकि असली
विक्टिम , अगर कोई है तो , वो दहेज देने के समय शादी से माना कर सकती है, या
फिर एक क्रूर पार्ट्नर से संबंद तोड़ सकती , कभी भी.
7. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर आश्चर्य जताया है कि
498A के अधिकाशं केसो में समझौता कैसे हो जाता है (?) जबकि यह धारा (498A)
गैर-समझौतावादी है? किस प्रकार एक वादी (पत्नी ??) 498A का केस करके, एक
समझौते के तहत एकमुश्त पैसा प्राप्त कर लेती है और फिर उसी माननीय कोर्ट
के समक्ष अपने पूर्व के आरोपो को वापिस ले लेती है ???
8. शोयिब मलिक पर 498A लगाया था, परंतु क्या मुद्दा दहेज का था ?
हर कोई जानता है, की मुद्दा पैसे का था और पैसा देते ही खत्म हो गया| मेरठ
का नितीश-आडति प्रकरण भी अभी ज्यादा पुराना नही हुआ है कि किस प्रकार से
लङ्की व उसके अभिभावको ने इस दहेज़ विरोधी क़ानून (498A) का दुरूपयोग कर
रहे है।
9. यह क़ानून लीगल टेररिज़म है, जो की देश की नवयुवक पीढ़ी की
उर्जा ओर और समय को खा रहा है, अगर देश का युवा ऐसे ही अदालत मे समय लगता
रहा अपने को निर्दोष साबित करने के जद्दोजहद में तो कैसे हम मुकाबला करेंगे चीन, अमेरिका, जापान से ?
10. इसी कानून (498A) मे एसे प्रावधान भी होने चाहिये जिससे कि
केस को लम्बित रखने और केस के झूठे सिद्ध होने पर वादी को सज़ा मिल सके,
जिससे दहेज़ विरोधी क़ानून (498A) का दुरूपयोग रोका जा सके ।
धनयवाद,
कमल हिन्दुस्तानी
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